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अपने देश में हम पराया कइसे? काहें?

अनिल ओझा नीरद

Anil Ojha Nirad

 

आजु बहुत दुख के साथ ई प्रश्न उठावे के हमार इच्छा हो रहल बा, जब अपने देश के ऐगो प्रांत असम के कुछ मतिभ्रम लोग, गैर असमिया कहि के, उहाँ रहे वाला हिन्दीभाषी आ खास क के बिहारी लोगन के नृशंश हत्या कइ रहल बा, आ अपना प्रांत से निकलि जाये के धमकी दे रहल बा. एह घटना से खाली हमरे ना बल्कि हमार विचार बा कि एह देश के हर आदिमी के मन में ई प्रश्न जरुर उठल होई कि, तब का असम अब एह देश के अंग ना रहि गइल ? का अपने देश में अब हमनी का पराया हो गइनी? कइसे...?? काहें... ???

 

का असमिया भाषी कल्पना अब भोजपुरी गायिका ना कहइहें ? का बिहारी लोगन का अपना प्रांत के एगो खास आ मशहूर भाषा भोजपुरी, जवना में गायकी का बल पर उ खाली अपने देश में ना, बल्कि विदेशों में भी मशहूर भइली, आ भोजपुरी के सुपर गायिका के खिताब पवली, उनुका के अब भोजपुरी गावे से रोकि देवे के चाहीं? उनुका गायन, कैसेट, अलबम, आ फिल्मन के बाइकाट करे के चाहीं ? का उनुका बिहार प्रवेश पर रोक लगावे खातिर आन्दोलन के सहारा लेवे के चाहीं ? का भूपेन हजारिका जइसन असमिया भाषी गायक के नाम, हिन्दी सिनेमा जगत के विकास में दीहल उनुकर योगदान, गायकी आ संगीत के एह क्षेत्र से निकालि देवे के चाहीं ? का इन्दिरा गोस्वामी जइसन असमिया कथाकार के नाम, भारतीय साहित्य जगत में ना सुमार होखे के चाहीं ?

 

आ अइसने जाने केतने सवाल पैदा क देले बा इ मुद्दा, हर भारतीय के जेहन में. अपने देश में रहि के कइसे कवनो आदिमी, अपने देश के कवनो दोसरा प्रांत में ना रहि सके ? ओहिजा के विकास में आपन योगदान ना कइ सके ? ओहिजा से आपन रोजी-रोटी ना जोगाड सके ? ओहिजा रहि के आपन कारोबार ना कइ सके ? सालों साल ओहिजा रहला का बादो, ओहिजा के माटी-पानी से जुडला का बादो, आ ओकरा विकास में आपन खुन-पसीना बहवला का बादो, कवनो आदिमी खाली एह बात से कइसे ओहिजा खातिर प्रवासी रहि जाई कि ऊ ओह प्रांत के मूल निवासी ना ह. जब ई पुरा देश आपन ह्, त कइसे कवनो प्रांत के आदिमी, कवनो दोसरा प्रांत में, सीना ठोकि के ना रहि सके, कि ई देश हमार ह आ हम एह देश के नागरिक हईं. हमरा एह देश के कवनो प्रांत में रहे के पूरा पूरा संवैधानिक अधिकार बा. हम प्रवासी भारतीय ना हईं, पूरा पूरा भारतीय हईं आ हमरा के एह देश के कवनो कोना में रहे से केहू ना रोकि सके. ई प्रांतीय व्यवस्था शासकीय सुविधा खातिर कइल गइल बा, देश के तूरे खातिर ना.

 

फेर एगो बड प्रश्न हमरा जेहन में आजु इहो उठि रहल बा कि हमेशा अइसन बिडम्बना खाली बिहारिये लोगन का संगे काहें होला ? चाहे महाराष्ट्र के मुम्बई होखे, जहाँ एक बेरि शिवसेना जइसन पार्टी के गठन खाली एही मुद्दा पर भइल रहे कि यू.पी आ बिहार के लोगन के इहाँ से खदेडे के बा. आ एह प्रांत के खाली मराठी बहुल राज्य रखे के बा. हलांकि बाद में एकरा गठनकर्ता लोगन के आपन भूल समझ में आइल, काहें कि बिहारी लोगन के खदेडला के क्रम में ओह लोगन के ई अहसास भइल कि, एह से ओहिजा कुशल मजदूर वर्ग के कमी होखे लागल बा, जवना से एह प्रांत के तरक्की बाधित हो जाई आ तब जाके ई सिलसिला थमल.

 

अइसने एगो विडम्बना एहिजो यानी बंगाल आ कलकत्ता महानगरो में देखे के मिलल जब एहिजा सी.पी.एम. पार्टी के गठन के बाद पूरा पूरा सत्ता अपना कब्जा में लेवे के प्रयास में सी.टू नामक एकर ट्रेड युनियन के ईकाई इहाँ के उधोग-धन्धा पर आपन कब्जा जमावे लागल, तब सबसे पहिले आ सबसे बेसी जवन उधोग प्रभावित भइल, उ रहे इहाँ के जुट उधोग, जवन एक युनियन के दबाव में लगातार बन्द होत चलि गइल. एहिजा के जुट उधोग के कमर त एहिसे टूटबे कइल, बाकिर सबसे बेसी जेकर कमर टूटल, उ रहले एही बिहारी तबका के लोग, जेकरा नब्बे प्रतिशत लोगन के एह क्षेत्र में मजदूरी पर कब्जा रहे. लोग तबाह हो गइल, बरबाद हो गइल, आ एगो भारी संख्या में ई तबका बंगाल छोडे पर मजबूर भइल. आजु एक बेरि फेर, अइसन एगो दृश्य, फेर से इहाँ उअभरे वाला बा, जब सरकार इहाँ से हाथ रेक्सा हटावे के प्रस्ताव लेले बिया. कहे के जरुरत नइखे कि एहू कारोबार से सबसे बेसी बिहारिये समुदाय जुडल बा.

 

अउर अब असम में जवन शुरु भइल बा, उ त केहू से छिपल नइखे, काहें कि घटना एकदम ताजा ताजा बा आ एकदम जघन्य बा. माफ करे लायक त हइले नइखे, कबो भुलाहूं लायक नइखे. ना रिपोर्ट ना सुनवाई, सीधा फांसी. यानी दोसरा कवनो प्रांत का अपेक्षा क्रूरतम कृत्य कहे काये लायक. आतंकवाद के पराकाष्ठा कहाई ई. अभी कुछ दिन पहिलहूं भइल रहे इहाँ अइसन, जब बिहारी लोगन के इहां से खदेडल गइल रहे, बाकी अब दृश्य दूसर बा, सीधा मारल जा रहल बा. यानी कुल मिला के पिसाता के? त बिहारी! काहें... ???

 

(लेखक प्रसिद्ध भोजपुरी पत्रिका 'भोजपुरी माटी' के संपादक आ भोजपुरिया डॉट कॉम के साहित्य विभाग के संपादक बानी)

 

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