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बिहारी मजदूर के नाम से मशहूर, बिहार के लोगन के एगो तबका, ना खाली
अभीं, बल्कि अंग्रेजी शासन का समय से, एह देश में खासा मशहूर बा,
एह काम खातिर. त असहीं ना नू. ओकरा में कवनो खासियत त जरुर होई. त
बा उ खासियत, आ उ खासियत बा अपना काम में कुशल भइल्, कर्मठ भइल आ
सबसे उपर कि सबसे सस्ता दर पर उपलब्ध भइल. अपना कुशलता आ कर्मठता
से बेसी, एमें दु राय नइखे कि, ई लोग अपना सस्ता दर खातिर मशहूर
भइल, बाकी जब मशहूर भइल त एहू में कवनो दू राइ नइखे कि आपन
लोकप्रियता आ मांग बनवले रखला खातिर ई लोग अपना काम में कुशल आ
कर्मठ साबित होत चलि गइल. देश के जवना कोना में गइल, ओकरा के
निखारि दीहल. चाहें बंगाल के जुट उधोग होखे या असम के चाय उधोग,
बाकी एकरा बदला में ओह लोगन के आजु का मिली रहल बा, ई त केहू से
छिपल नइखे. त सवाल फेर उठS
ता
कि आखिर का फायदा एह कुर्बानी के ?
आ
जब ई सवाल उठS
ता त फेर हमरा मन कर ता एके सवाल करे के
–
उहो तब से अब तक के बिहार सरकार से कि
–
भइया, आखिर तोहार आत्मसम्मान कहिया जागी ? का तहार जमीर कहियो ना
जागी ? का तोहरा प्रांत में मजदूरे पैदा होत रहिहें ? का तूं ना
पैदा क सकS
कवनो मुम्बई, कलकत्ता, भा गौहाटी? दिल्ली, चंडीगढ भा लुधियाना जइसन
व्यावसायिक शहर, जहाँ तोहरे प्रांत का मजदुरन के बल पर उहां के
लोगन के तकदीर लिखल जा रहल बा. आजुवो एह देश के हर शासकीय कामकाज
में आ पइसा में जेकर निशान चलS
ता, ओह सम्राट अशोक के प्रांत से हव तूं. आजुवो जवना धर्म के
विदेशन तक के करोडों आनुयायी बाडे, ओह महात्मा बुद्ध के जन्म आ
निर्वाण प्रांत हव तूं. आजुवो जवना जैन समुदाय के लोग अपना के एह
देश के सर्वोत्तम विकसित समुदाय मानि के चलि रहल बा, ओह धर्म के
प्रवर्तक महात्मा महावीर के जन्मदाता हव तूं. आ आजुवो जवना समुदाय
भा वर्ग विशेष के, जवना के दुनिया में सबसे कर्मठ जाति मानल जाला आ
जेकरा बारे में मशहूर ह कि एह जाति के लोग के कबो केहू भीखि मांगत
ना देखि सके, ओह सिख समुदाय के पैदा करे वाला गुरु गोविन्द सिंह के
जन्मदाता हव तूं. एकरा बादो तूं अपना के निरीह बनवले घुमि रहल बाड
? सबकर ठोकर खात फिरत बाड. काहें ?
अउर एह काहें के कारण खोजत खोजत नजर आके टिकि जात बा सरकार पर.
जबाब मिलत बा कि एह कुल्हि के कारण बा आजादी से ले के अब तक के
बिहार सरकार के निकम्मापन. आजादी के बाद से ले के अब तक के बिहार
सरकार के कामकाज रउआ गौर से देखीं त पता चली कि सरकार चाहे केहू के
बनल, उ खाली अपना वर्चस्व का लडाई में आपन समय गुजार दिहलसि. आपन
प्रांत के जनता के भलाई आ रोजगार के बारे में कबो ना त सोचलस, आ
कुछु कइलसि. जमींदारी उन्मुलन के बादो, जब साधारण खेतिहर लोगन के
पास सिवाय जमींदार किहां मजदूरी करे के अउर कवनो जीविका के साधन ना
रहल, ओह लोगन के हाथ खेत के कवनो टुकडा ना लागल, आ उ लोग मजदुर के
मजदुरे रहि गइल. जन्मजात मजदुर.
जवना के चलते जब अपना प्रांत में एह लोगन के कवनो रोजगार ना मिलल,
त ई लोग आपन प्रांत छोडे आ मजदूरी के खोज में दर-दर भटके के मजबुर
भइल. अविभाजित बिहार में, जब एकरा पास अपार खनिज संपदा रहे, तबो ई
प्रांत आ एकर सरकार अपना लोगन खातिर रोजगार सृजित करे में नाकाम
भइल. उधोग-धंधा के नाम पर एगो टाटा स्टील के अलावा कवनो दोसर उधोग
बिहार में स्थापित ना हो सकल, जवन अब उहो झारखण्ड में चलि गइल.
इहां हम इयादि दिया दीं कि जवना महेन्द्रा के ट्रैक्टर सबसे बेसी
आजु बिहार में चलि रहल बा, ओकरो कारखाना महाराष्ट्र के नासिक नगर
में स्थापित बा. इहे ना जवना बिहार के बड बड नेता आ माफिया लोगन के
पासे आजु शानदार बोलेरो आ स्कार्पियो गाडी बाडी स, उहो दूनो
महेन्द्रा के नासिक कारखाना में तैयार होली स.
त
का एह कारखानन के लगावे के व्यवस्था इहां के सरकार अपना किहां ना
करि सकत रहे ? लेकिन सरकार के एहसे कवनो सरोकारे ना रहे. आजादी से
ले के अब तक जवन कारोबार सबसे बेसी फइलल, ऊ रहे सबसे बड पैमाना पर
माफियागिरी. चाहें उ भू-माफियागिरी होखे, चाहे कोयला माफियागिरी.
अपहरण, बलात्कार, आ फिरौती माफियागिरी, जवना से आम जनता के कवनो
सरोकार ना रहे, आ ऊ आपन इज्जति आ जिनगी बचावे खातिर प्रांत छोडे पर
मजबुर भइल, उहो मजदूर के रुप में. आखिर ई गरीब जनता अउर बनि का सकत
रहे, सिवाय मजदूर के ? हमरा त ई कहे में तनिको संकोच नइखे होत कि
जवना गांधीगिरी के आजु फेर से एह देश मे धुम मचि रहल बा, आ जेकर
गूंज फेर से विदेश तक में गूंजि रहल बा, ओह गांधी के महात्मा बनावे
के श्रेय एही बिहार के बा. जब ऊ अपना जीवन के पहिला लडाई सत्याग्रह
के माध्यम से, एही बिहार के चम्पारण से शुरु कइले रहले. तबो एह
प्रांत में आजु माफियागिरी धडल्ले से फलि-फूलि रहल बा, ई घोर अचरज
नइखे त का बा. घोटाला, हवाला आ नक्सलवाद के त बाढि आ गइल बा एहिजा.
अइसे में एकरा तरक्की के कवनो रास्ता हमरा त नइखे नजर आ रहल. तब
प्रश्न फेर उहे खडा हो रहल बा कि आखिर कब चेती एहिजा के सरकार आ कब
जागी बिहार के लोगन के आत्मसम्मान ???
किसान से मजदुर होखे के पीडा एगो किसान से बेहतर के जान सकी. आजु
जहां एह देश के हर क्षेत्र के किसान धडाधड आत्महत्या क रहल बाडे,
ओकरा में एहू बात पर एगो प्रश्नचिन्ह लागि रहल बा कि का अब ई देश
कृषि प्रधान देश ना रहि गइल, जवना खातिर ई कभी पुरा विश्व में
मशहूर रहे. अइसन में बिहार के लोगन के समस्या के अंत होत नइखे
लउकत. बिहार, जहाँ खेती छोडि के कबो दोसर रोजगार केहू के पास रहबे
ना कइल, बाकी जहां के लोग अपना एह कारोबार के मजा कबो जमि के ना
उठा पावल. कभी सूखा, कभी बाढि से तबाह होत इहां के खेती का ओरि त
ना कवनो सरकार ध्यान दिहलसि, ना एकरा खातिर रोकथाम के कवनो उपाइ
कइलसि. अइसन में बिहार के लोगन के पासे का चारा रहे, कि ऊ लोग अपना
रोजी-रोटी के जोगाड में दोसरा प्रांत के रुख ना करित. आजु पंजाब के
खेती लहलहा रहलि बिया बिहारी मजदूर लोगन का बलबुता पर, बाकिर बिहार
के खेत सूखि रहल बाडे स भा बहि रहल बाडे स त एकरा सरकार के
लापरवाही के चलते.
समस्या के समाधान कहीं लउकत नइखे सिवाय एकरा कि एहिजा के सरकार
चेतो. अपना प्रांत खातिर कुछु सोचो, करो. कुछ ठोस करो, जवना से एकर
तरक्की सुनिष्चित होखो. अपमानित बिहारी के सम्मानित बिहारी शब्द
बनावे खातिर सरकार के हिस्सेदारी सइ के सइ प्रतिशत जरुरी बा. बहुत
हो गइल वर्चस्व के लडाई, अब आत्मसम्मान के लडाई लडे के जरुरत बा.
सरकार के पासे साधन के कमी नइखे, बस ओकर सोच सार्थक भइल जरुरी बा.
माफियागिरी पर अंकुश लगाईं, रोजगार सृजन पर ध्यान लगाईं, जवना जनता
के वोट पर चुनिके जा रहल बानी, ओकरा बारे में कुछ प्रतिशत त सोचीं.
बबुआ हो अबहू से चेत ना त चट चट,
जइब चटकि तूहूं फागुन का रेंड अस.
सवाल जब प्रांत के आत्मसम्मान के बा, त प्रांतीय सरकार के
जिम्मेदारी सबसे बेसी बा.
(लेखक प्रसिद्ध भोजपुरी पत्रिका 'भोजपुरी माटी' के संपादक आ
भोजपुरिया डॉट कॉम के साहित्य विभाग के संपादक बानी)
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