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पुरुष प्रधान समाज में महिला आरक्षण के बात?

पुरुष प्रधान समाज में महिला आरक्षण के बात? हरि ओम! हरि ओम!! भला अइसनो बात कइल जा सकेला कबों? जवना धरती पर सदियनि से नारी खाली भोग्या की रुप में रहलि बिया पुरुष के, ओह समाज में ओकरा के आरक्षण देवे के बात, उहो एक-दू परसेंट ना, पूरा के पूरा तैंतीस परसेंट यानी एकदम से ई ओकरा के आश्वस्त कइ देबे वाला बात नइखे होइ जात, साक्षात भसमासुर लेखां कि ल अब तोहरा एह हक में केहु सेन्हि ना लगा सके। अब अतना दूर में तूं जे चाहे से कर सकेलू।

हलांकि अइसन बात नइखे कि शताब्दी- दर- शताब्दी नारी के स्थिति में कवनो सुधार नइखे भइल आ एकइसवीं शताब्दी तक आवत- आवत त ओकरा बहुत कुछ हासिल भइल बा। मसलन मरद के कंधा से कंधा मिला के चले के अधिकार, बोले के अधिकार, पढे-लिखे के अधिकार, बराबरी के स्तर पर नौकरी चाहें व्यापार करे के अधिकार, नेता बने आ मंत्री के कुर्सी तक पर बइठे के अधिकार वगैरह, वगैरह।

लेकिन सवाल ई उठता कि अबहियों, अतना कुछ कइला का बादो, ई पुरुष समाज, हर क्षेत्र में वर्चस्व त्त आपने राखल चाहता, चाहें चाही। ऊ एगो नारी के प्रधानमंत्री के कुर्सी पर, राष्ट्रपति के कुर्सी पर, चाहें संसद के उच्चासन पर बइठाई के कुछ हद तक आपन बडप्पन त साबित कइ सकता, बाह-बाही त लूट सकता, लेकिन कवनो कीमत पर एह बात के अधिकार नइखे दे सकत कि संसद के तैंतीस प्रतिशत कुर्सी तोहार होई गइल, चाहें अतना के फैसला करे के तोहार परमानेंट अधिकार हो गइल।

रउवे कहीं, अइसन कइला पर ओकर ओकर सदियनि के संजोवल वर्चस्व के का होई? पौरुष के का होई?? अहंकार के का होई??? जवन सदियनि से ई साबित कइ रहल बा कि औरत ओकरे पांव के जूती। औरत ओकर भोग्या। औरत ओकरे घर के सिंगार। औरत ओकर सेविका। औरत ओकर आज्ञाकारी। अउर एकरे अलावे कुछ ना।

अउर ई बात आजु कवनो नया त पैदा भइल नइखे? एकर नेंव त कम से कम ओही दिन पडि गइल रहे जहिया सृष्टि के आरम्भ से धर्म उतरल त पुरुष के शरीर में। वेद, कुरान, बाइबिल, गीता उतरल त पुरुष के आत्मा में। साधु, संत, ऋषि होखे के अधिकार मिलल त पुरुष का। राजा होखे के अधिकार मिलल त पुरुष का। अवतारी देव होखे के अधिकार मिलल त पुरुष का। इहां तक कि एह देश के आजादी के बाद ओकर संविधान तेयार कइलसि त एकर पुरुष समाज। अउर आज ओही संविधान में व्यावधान डालि के, संसोधन कइ के नारी समाज के एगो नया अधिकार देवे के बात पैदा कइल का ओह पुरुष समाज खातिर कष्टकर ना साबित होई? ई सीधा सीधा का ओकरा अस्मिता पर चोट ना होई?

होई अउर जरुर होई, अउर इहे कारण बा कि आजु पिछिला कई साल से, यानि भाजपा के शासनकाल से लेके आजु तक जाने कतने बेर एह बिल के संसद में पेश कइल गइल, चाहें पेश करे के चेष्टा कइल गइल, बाकी नतीजा का भइल? ऊहे – ढाक के तीनि पात। कबों केहू बिदुकि गइल, त कबो केहू कोहना गइल। अउर अब त ई हाल बा कि केहू जहर खाये के बात करता त केहू फांसी लगावे के, आ कवनो कवनो पार्टी त अइसन बिदुकल बिया कि संसद से सामूहिक इस्तीफा देबे के बात तक कइ जात बिया। त रउआ सभ का सोचतानी कि अइसन में ई काम कबो हो पाई एह देश में? हमरा हिसाब से त कबो ना।

ओइसे हमहूं कवनो तरह के आरक्षण के पक्षधर ना हईं। पहिलहीं एह देश में जाने कतने तरह के आरक्षण दैइ के एह देश के, एकरा सिस्टम के कबाडा कइल जा चुकल बा। मसलन – अगडा-पिछदा के नाम पर, बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक के नाम पर, यानी जाति के नाम पर, धर्म के नाम पर, संप्रदाय के नाम पर, आ जवना-जवना क्षेत्र में ई आरक्षण कइल गइल बा, ओह में से कवनो के भला होत हम नइखीं देखत। चाहें ऊ शिक्षा के क्षेत्र होखे, चाहें नौकरी के। शिक्षा के ई हाल बा कि उच्च वर्ग के लइका टैलेंटेड भइला का बादो, हाइयेस्ट मार्क पवला का बादो रोकि दीहल जाता, ओकर एडमीशन नइखे हो पावत आ रिजर्वेशन कोटा के अयोग्य से अयोग्य लइकनि के आगे के पढाए के मौका दे दीहल जाता। नतीजा होता कि आजु शिक्षा के स्तर कहां पहुंचि गइल बा एकरा बारे में अलग से बतावे के कवनो जरुरत नइखे रहि गइल। ठीक इहे हाल नौकरियो के क्षेत्र में बा, कारण शिक्षे वाला फार्मुला एहू क्षेत्र में अपनावल जाता, जवना के नतीजा आजु सामने आ रहल बा कि खाली एही देश के अर्थव्यवस्था ना सउंसे विश्व के अर्थव्यवस्था चरमराइ गइल बा।

हम त कहत बानी कि एह देश से हर तरह के आरक्षण समाप्त क देबे के चाहीं आ योग्यता के हिसाब से सबके उचित जगह मिले के चाहीं, ताकी लोगन में कम्पटीशन के भावना पैदा होखे आ देश के योग्य नौकर आ प्रशासक मिलसु। ठीक इहे बात हम महिला आरक्षण के बारे में कहल चाहब कि सरकार अगर ई आरक्षण ओह लोगन के नइखे दीहल चाहत त मत देउ बाकी कम से कम ओह लोगन के मजाक त मति बनावल करो जब ना तब। अरे, हम त कहतानी कि जहिया से ई देश अपना औरतन के सम्मान कइल शुरु क दी, तहिये से स्वर्ग बनि जाई। ...यत्र नारी पुज्यन्ते... !!!

(लेखक प्रसिद्ध भोजपुरी पत्रिका 'भोजपुरी माटी' के संपादक आ भोजपुरिया डॉट कॉम के साहित्य विभाग के संपादक बानी)
 

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