Home Sahitya Aalekh मराठी मुद्दा पर वर्चस्व के लड़ाई लड़त चाचा-भतीजा

मराठी मुद्दा पर वर्चस्व के लड़ाई लड़त चाचा-भतीजा

E-mail Print PDF

पढि के ताज्जुब होई रउआ सभ के ई हेडिंग। लेकिन साहब ई एकदम सांच बात बा कि आजु के दिन जवन कुछ महाराष्ट्र में मराठी मानुष के नांव पर हो रहल बा, ऊहो पूरा महाराष्ट्र में ना, खाली मुंबई में, ऊ बहुत कुछ होखे वाली घटना ना ह, बल्कि चाचा- भतीजा के वर्चस्व के लड़ाई ह, ऊहो एतना घटिया स्तर के लड़ाई जवना के रउआ सभ दू गो निचिला स्तर के गुण्डन के इलाका दखल के लड़ाई कहि सकिले।

चाचा, यानी परमपूज्य प्रात: स्मरणीय बाला साहेब ठाकरे महाशय आ भतीजा माने अभी- अभी रामावतार, चाहें कृष्णावतार लिहले भगवान राज ठाकरे साहब। ना... ना... हमरा खातिर ना, एह देशो खातिर ना, बल्कि खाली महाराष्ट्र खातिर, मराठी मानुष खातिर, जइसन कि एह लोगन के कहनाम बा। अब ई दीगर बात बा कि संउसे मराठी समुदाय एकरा के नइखे मानत, काहें कि ओहिजो त कांग्रेसी मराठी बाड़े, राष्ट्रवादी कांग्रेसी मराठी बाड़े, बीजेपी मराठी बाड़े, समाजवादी मराठी बाड़े अउर थोडे- बहुत शिवसैनिक चाहें मनसे मराठियो बाड़े। अउर अगर अइसन ना रहित त भला एह लोगन के हतना प्रयास का बादो उहां बेर-बेर कांग्रेस सरकार काहें बनित? ओइसे हमरा खातिर त ई लोग ओसहूं प्रात: स्मरणीय चाहें श्रद्धेय के कटेगरी नें ना आ सके, काहें कि हम त एगो खांटी भारतीय हईं पहिले, फेर मजगर भोजपुरिया हईं, जवन एह लोगन के एह घरी खास दुश्मन बाड़े, फेर हम बंगाल में बानी त अपना के बंगालियो समाज से अलग ना मानीं।

बाकी ई लोग, खांटी मराठी ह लोग साहेब, एही से त देखीं ना, आजु ले अपना महाराष्ट्र रुपी खोल से कभी बाहर निकलले नइखे लोग, ओहू में मुंबइयो के कुंआ से बाहर त शायदे कबो निकलल होई लोग, भा निकललो होई लोग त कबो-कबो, ऊहो बेसी दूर ना, जादा से जादा पुणे चाहें नासिक, भा नागपुर तक। पूछीं एह लोगन से कि का ई लोग कबो दिल्ली देखले बा? अहमदाबाद, चंडीगढ, वाराणसी, पटना, राँची, कोलकाता, गुवाहाटी, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, कटक, हैदराबाद, चेन्नई, बैंगलोर चाहें तिरुअनंतपुर देखले बा? कबो गइल बा, कबो ओहिजा के लोगन के बारे में सुनले बा, जनले बा, बोलले बा, बतिअवले बा, ओह लोगन का सुख-दुख में शामिल भइल बा? अरे छोडीं साहेब, एह देश में केतना शहर बाड़े सन एकर त एह लोगन का नांवो पता ना होई, त फेर ई लोग राष्ट्र के मोल का जानी?

फेर एह लोगन के जनला के जरुरतो का बा साहेब, ई लोग त कुंआ के मेढक ह, बस कुंवे में रही आ ओहिओ के अपना वर्चस्व के लडाई में नरक बनवले रही, कि हम बड़ त हम बड़। हम चाचा त हम भतीजा। हम बाप त हम बेटा।

ई सारा खेल खाली एही वर्चस्व के पीछे बा साहब अउर कुछ ना। ऊ चाहें उत्तर भारतीय के नांव पर हंगामा होखे, चाहें रेलवे भर्ती बोर्ड के परीक्षा के हंगामा, चाहें हाले में भइल महाराष्ट्र विधानसभा के भीतर के हंगामा, चाहें एकदम ताजा सचिन तेंडूलकर के अपना के सच्चा भारतीय कहला पर भइल हंगामा। इलाका दखल हो जाई, मामला अपने शांत हो जाई। कइसे शांत हो गइल रहे तब, जब दक्षिण भारतीयन के विरोध से अपना के चमका के आ चरचा में ले आके, एक बेरि बाला साहेब महाशय अपना के शिवसेना के गॉडफादर बना लिहले रहले, लेकिन एक दिन ऊहे अपना धृतराष्ट्री मोह का चलते अपना योग्य भतीजा राज ठाकरे के अपना पार्टी में उभरत देख के अपना पार्टी आ घर दूनों से निकालि दिहले आ अपना अयोग्य पुत्र उद्धव ठाकरे के आपन युवराज घोषित कइ दिहले त आपन वर्चस्व अपना चचे के खिलाफ कायम करे खातिर राज ठाकरे छपिटाये लगले आ एकर उपाय सोचे लगले। बस सोचत- सोचत उनुका उपाय मिलि गइल। ऊ आपन अलग एगो पार्टी बनवले, आ पिलि पड़ले उत्तर भारतीयन पर। चाचा दक्षिण भारत से शुरु कइले रहे, त भतीजा उत्तर भारतियनि से शुरु कइलस, आखिर उलुटा त जाहिं के रहे ओकरा, ना त कुछ अलग कइसे होइत, कुछ नया कइल कइसे कहाइत, से भइल, आ देखते देखत एक दिन अपना बूढ होत चाचा आ कमजोर पडत भाई के कंधा आ छाती पर आपन गाडि दिहलसि। हो गइल रातों-रात चर्चित। भले आतंक का पर्याय का रुप में, लेकिन आ त गइल अपना चाचा का बराबरी में, चर्चा में।

अरे भाई ई त समय के चक्का ह, चलत चलत कबों केहू के चित त केहू के पट करत रहेला। आ चरचा में रहे खातिर कवनो जरुरी बा कि निमने काम कइल जाउ? बाउरो से त हो सकेला? अब राम चर्चा में अइले त का रावण ना आइल? अर्जुन अइले त का दुर्योधन ना आइल? कृष्ण अइले त कंस ना आइल? अब रउवे बताईं भला कि का ई कथा सभ एक दोसरा के बिना पूरा हो सकत रहली स? ... ना नूं।। त इहे भइल एहू मामला में। चलि पड़ल बा अब चाचा-भतीजा में, अपना- अपना इलाका दखल के वर्चस्व के लड़ाई। एह में भले चाहें मराठी मानुषे काहें ना पिसा जासु, बाकी मराठी मानुष के एकछत्र नेता बनला बिना एह लोगन के आत्मा के शांति कहां मिले वाला बा भला?

का रावण अपना जाति के रक्षा ना कइल चाहत रहे, त का ओकरा कुल खानदान भा देश के लोग, चाहें ओकर सेना आ रक्षक लोग ओह में ना पिसाइल? रामायणो में ऊहे भइल, महाभारतो में ऊहे भइल, त एह में भला कइसे ना होई? अब बाला साहेब त पाकल आम होइये चलल बाड़े, आजु टपकसु चाहें काल्हु, लेकिन असली लड़ाई त राज अउर उद्धव में बा अब, त जहिया एह दूनो जाना में हार-जीत के फैसला हो जाई, तहिया अपने आप कुल्हि ठीक हो जाई, फेर कुछ दिन खातिर, लेकिन बुझाता कि ऊ समय आवे में अभीं कुछ देर बा, तब तक त एह देश चाहें महाराष्ट्र के धरती का विनाश के कुछ दौर देखहीं के पड़ी, भोगहीं के पड़ी।

(लेखक प्रसिद्ध भोजपुरी पत्रिका 'भोजपुरी माटी' के संपादक आ भोजपुरिया डॉट कॉम के साहित्य विभाग के संपादक बानी)


Related news items:

 
Comments (2)
रंगल सियार भीजल बिलार के हाल बना देहनी ऊ चाचा भतीजा के !!!
1 Wednesday, 18 November 2009 22:55
Navin Bhojpuria
नीरद जी पाहिले ता रउवा के परनाम बाटे

रउवा लेख के हमरा बहुत इन्तेजार रहे ला काहे की रउवा लेख में हमके अपना भोजपुरिया माटी के सोंह खुशबु मिले ला , अब देख ली " मजगर भोजपुरिया " में " मजगर " शब्द आज कल बहुत कम पढ़े आ सुने के मिळत बाटे आ हम बहुत पाहिले एह के सुनले रहनी लेकिन हमरा ध्यान में भी ना रहल जवान की आज रउवा लेख से पढ़े के मिल गईल आ हम आज एहसानमंद हो गईनी राउर काहे से की बहुत कुछ भोजपुरी में सीखे के चाह हमके रउवा से मिलल बाटे |

मुद्दा के बात ई बाटे की राउर दू गो रंगल शियारन के उपार कई बाल्टी पानी डाल देले बानी आ पानी डाल देला के बाद ओकनी के रंग ता उतर गयिबे कईल साथ साथ में भीजल बिलार लेखा गति हो गईल बाटे ,जी हम सही कहत बानी , अगर ओकनी के राउर ई लेख पढ़ लिहन सा ( एगो परेशानी बाटे की ओकनी के भोजपुरी ना आवेला लेकिन कुछ चमचा होई ऊ पढ़ के सुना दी) ता ओकनी के गति इकदम भीजल बिलार आ रंग उतरल शियार नियन हो जाई |

जहा तक बात बाटे मराठी मानुष के ता आज राज ठाकरे आ बाला साहेब ठाकरे मराठी मानुष के खून पसीना से आपन दिया जरावत बालो ऊ अब सबके बुझाये लागल बाटे जैसे की रउवा bataa देले बानी की चुनाव में का भईल बा आ अब धीरे धीरे मराठी लेखक , पत्रकार , फिल्मकार भी ऊ दुनो चाचा भतीजा के विचार , सोच के खिलाफ सामने आ रहल बाटे आ ताजा तरीन उदाहरण सचिन तेंदुलकर बाड़े जवन ओकनी के सोच के इक दम सिरा से नकार देले बाड़े आ बस और लोग एह अभियान में ( मराठी मानुष ) शामिल हो रहल बाड़े आ कहल जाला नु की भगवान् के घर देर बाटे , अंधेर ना ता अब अंधेर चाचा भतीजा के सोच पे होई आ अगर चाचा पकला के बाद गिरे वाला ता भतीजा के अइसन हाल होई , अइसन हाल होई की उनका लुकाये के जगह ना मिली आ पिछाड़ी बांह के घुमावल जयिहें |

इक बार रउवा के फेरु से धनयवाद देत बानी !

जय भोजपुरी के साथ शत शत नमन रउवा के बस ऐसे ही भोजपुरिया खातिर अंजोर कईले रही

राउर आपने
नवीन
marathi mudda par chacha-bhatiza
2 Friday, 20 November 2009 00:43
ashok sharma atul
kabir das ne kaha hai ki jo wakai sansar arthat manvata ke subhchintak hote hai, we pehle apna ghar phoonketein hai. bal-raj thakrey bhi apna hi ghar phoonk rahe hai. bas fark itna hai ki baba kabir ki vaani mein puri dunia ki bhalai hai. jabki een do "tathakathik marathi veeron" ki jubaan se na sifr hamare marathi bhai bejar hai, balki bharat ko todne ka apni or se bharpur koshish mein lage hai. chunki ye jaan chuke hai ki eenki aukat "Kuyein me baithe medhak" je jyda nahi. Isliye rah-rah kar Khisiyani billi khambha noche wali harkat karte rehte hai.
Darasal politics to pure hindustan ki hi kharab hai. Isliye raj-bal jaison par kalam chalane se achcha hai ki inhe kalam biradari se hi bahiskrit kar diya jaye.
Banner