Home Sahitya Aalekh तेलंगाना के बहाने खडा होत यक्ष - प्रश्न ?

तेलंगाना के बहाने खडा होत यक्ष - प्रश्न ?

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अउर प्रश्न ई कि तेलंगाना जइसन प्रांतन के निर्माण से असली फायदा केकरा होई? का आम जनता के? कि ओह प्रांतन पर शासन करे वाला नेता वर्ग के? ...केकरा फायदा भइल बा अलग झारखंड बनला से, छत्तीसगढ, उत्तराखण्ड जइसन राज्यन का बनला से?

सिवाय एकरा कि एह से कुछ नया मुख्यमंत्री पैदा भइले, उनुका संगे उनुकर कैबिनेट पैदा भइल, सरकार बनावे के जोड तोड नया सिरा से भइल, नया सिरा से लेन देन भइल आ नेता वर्ग के नया सिरा से चानी हो गइल। अउर अगर अइसन ना रहित त का मजाल रहल हा कि बित्ति भरि के प्रांत झारखंड के मात्र एक साल मुख्यमंत्री रहला का बादो मधु कोडा साहब जइसन, अपना पार्टी के एकलौता एम. एल. ए., अरबों- खरबों के घोटाला करे में सफल हो पइते? चाहें करे के साहस कइ पइते? लेकिन ओने देखीं, जवना आदिवासी लोगन के आन्दोलन का चलते ई राज्य बनल, तनी जा के ओह लोगन का आंगन में झांकी त, का ओह लोगन के हालत में, तब के अपेक्षा, कउडियो भरि सुधार भइल, अब ले?

तब हमार प्रश्न, यक्ष प्रश्न जइसन मुंह बवले, एह देश के जनता से ई सवाल कइ रहल बा, कि का तबो हमनी का अतना टुकडा में बंटे के चाहीं? का ई उचित होई? का आम जनता का सचहूं सुराज मिलि जाई? किसान वर्ग फांसी ना लगाई? पढल- लिखल बेरोजगार का रोजगार मुहैया हो जाई? उहो बिना सिफारिस से? बिना घूस के? का झारखंड, छत्तीसगढ आ उत्तराखंड के बेरोजगारी मिटि गइल? का ओहिजा के प्रशासन स्वच्छ हो गइल? ईमानदार हो गइल? अपना जनता के हित-चिंतक हो गइल?

हम जानतानी एह प्रश्न पर रउरा सब के जबाब नकारात्मक होई, जे आम जनता के नजर से सोचत होई, लेकिन आपन नेतागिरी चमकावे वाला लोग त हमरा के गरिअइबे करी, कि तूहीं ढेर चल्हाक आ ईमानदार चिंतक हो गइल बाड देश के। का एह प्रांतन के बनला से खाली एसेम्बलिये एगो बनी नया? हाईकोर्ट ना बनी, राज्यपाल के आफिस ना बनी, अउर अउर प्रशासनिक दफ्तर ना बनी? त का ओह दफ्तर में नेते लोग नौकरी करी? नया रोजगार ना सृजन होई? ...हम कहतानी होई। लेकिन तब सवाल त हम उपरे टांकि देले बानी कि का बिना घूस- सिफारिस के? रउआ सभ आम जनता के फायदा गिनवाईं, गरीबी रेखा के उपर- नीचे के फायदा गिनवाईं। आपन आ प्रशासन के फायदा ना।

अउर अगर अइसन ना होई त का फायदा एह छोट राज्यन के निर्माण से? जनता के नया सिरा से खुन चूसे के प्रयास से? ...हम जानतानी रउरा सभ जरुर पूछल चाहबि कि एह से जनता के नया सिरा से खुन कइसे चुसाई, ऊ त पहिलहीं चुसा रहल बा। लेकिन ना, हमार जबाब बा कि नया सिरा से एह तरी चुसाई कि जतने प्रांत बनी ओतने नया बार्डर बनी, दूगो प्रांतन के बीच के बार्डर। फेर सेलटैक्स बार्डर, चुंगी बार्डर, आरटीओ बार्डर, पुलिस महकमा के बार्डर वगैरह, वगैरह। अब व्यापारी वर्ग का अगर आपन माल कलकत्ता से मानि लीं कि दिल्ली ले जाये के बा, रोड ट्रांसपोर्ट के माध्यम से, त जहाँ ओकरा पहिले खाली बिहार-बंगाल बार्डर, फेर यूपी-बिहार बार्डर, आ अंत में यूपी-दिल्ली बार्डर के चेकिंग से गुजरे के पडत रहल हा, ओकरा में फिलहाल इजाफा हो गइल बा बंगाल-झारखंड बार्डर, आ यूपी-उत्तराखंड बार्डर, अउर अगर अउर प्रांत बनल खाली एही राज्यन में, जइसन कि मायावती जी कहतारी, चाहें लालू जी माँग कर तारे, एही तेलंगाना के बहाने, त फेर सोचीं कि व्यापारी वर्ग का केतना बार्डर का चेकिंग से गुजरे के होई, आ जब गुजरे के होई त अइसहीं ना नू। जेकरा एकर सिस्टम मालुम बा, ऊ बखुबी जानता कि, अगर माल ओह राज्य के होखो चाहें ना होखो, सही कागज-पत्तर देखवला के बादो, ओह बार्डर के बाबू लोगन के पूजा चढवला बगैर ऊ माल आगे ना बढि सके, कारण फेर ऊ लोग गाडी रोकि के माल सर्च कइला के बहाना से, कागज पत्तर के सही भइला के जांच के बहाना से, कई कई दिन तक परेशान कइल शुरु करी, जइसन कि अबहियों एह मामला में, जेतना बड प्रांत बाडे, हर बार्डर पर होला, त फेर ई खर्च व्यापारी वर्ग अपना पाकिट से त दी ना, वसूली त जनते से।

फेर एह मामला में एगो अउर प्रक्रिया बा, तनी ओहू पर सोचीं। अभी जवन माल ढोवे वाली ट्रकन के परमिट के नियम बा, ऊ ई बा कि कई प्रांतन से होके गुजरे वाली गाडी एकमुश्त नेशनल परमिट ले सकेली स, जवना में अपना इच्छा के मुताबिक, अपना रस्ता में आये वाला पांच गो प्रांतन के चुनाव कइल जा सकेला। अब जब बंगाल से दिल्ली तक पांच से बेसी प्रांते बनि जइहनि स त मजबूरन ओह गाडिन का, बीच में आये वाला हर प्रांत के परमिट खर्च देबे के पडी। यानी जेतना परमिट खर्च में अभी ई गाडी गुजरात-पंजाब तक पहुंचि जा तारी स, ओतना में त दिल्लियो तक पहुंचल कठिन हो जाई। त फेर ई खर्च केकरा कपारे पडी, जनता का कि नेता का?

अउर अंत में एगो सवाल, आ अंत में एह से कि हम जवन जवन बात उठा रहल बानी, अइसन त हजारों लाखों मुद्दा बाडे स, जवना के ना कवनो जबाब बा ना अंत, लेकिन हमार अंतिम प्रश्न तनी दर्दनाक चाहें भावनात्मक जरुर हो जाई- कि का आपन देश, फेर से ओइसने हो जाई, जइसन आजादी से पहिले रहे, यानि छोट-छोट राजा-रजवाडा, निजाम, नबाब लोगन के बपौती? त फेर ओह मेहनति आ कुर्बानी के का होई जवन आजादी के बाद वल्लभ भाई पटेल जइसन एक देश, एक राष्ट्र के चिंतक नेता कइले रहले। कतना पसेवा से ऊ एक-एक रजवाडा आ निजाम के तूरि के, देश में मिलवले रहले, एगो राष्ट्र बनवले रहले। फेर उचित समय पर कुछ उचित कारण से कुछ प्रांतन के निर्माण भइल, लेकिन एकर मतलब का ई होखे के चाहीं कि आजु कुछ स्वार्थी नेतन के अपना पद-लोलुपता का चलते, देश के टुकडा पर टुकडा होत चलि जाये के चाहीं, आ जनता का मूक दर्शक चाहें बेचारा बनल रहे के चाहीं?

आजादी के बाद के एकही बडहन बंटवारा, जाने केतना गहिरा घाव कइ गइल रहे एह देश के छाती पर, जवना के टीस आजु ले नइखे ओरात, त अब एह तेलंगाना का बहाने, अउर अइसन घाव, एह देश के, एह धरती के दिहल ठीक होई? हमरा खुद एह यक्ष-प्रश्न के जबाब अपने से नइखे मिलत, एह से हम ई प्रश्न रउआ सभ का बीच उछालि रहल बानी, कि हमनी का कब तक एह नेता वर्ग के सोच के कायल बनल रहबि जा? कब तक खाली एह लोगन के फायदा खातिर अपना के मोहरा बनावत रहबि जा। ई उहे मायावती नू हई जे आजु ले अपना प्रांत से, भोजपुरी के मान्यता खातिर चिठ्ठी तक ना लिखली, आ ई ऊहे लालू बाबू नू हवे, जे पिछिला संसद में अतना पावर में रहला का बादो, भोजपुरी के मान्यता ना दिलवा पवले, त अब कइसे चट से पूर्वांचल के मांग कइ दिहले, मौका मिलते। जानतारे नूं कि भोजपुरी भाषा के मान्यता मिलले उनुका कवनो राजनीतिक लाभ ना होई, बाकी कवनो नया राज्य बनी त उनुका आ उनुका पार्टी के नया सिरा से खेले-खाये के मौका मिलि जाई। लूटे के मौका मिलि जाई। ...हमरा हिसाब से त जनता का एह चालबाज नेतन के फितरत से सावधान रहे के चाहीं। बाकी जइसन सभके मरजी।

(लेखक प्रसिद्ध भोजपुरी पत्रिका 'भोजपुरी माटी' के संपादक आ भोजपुरिया डॉट कॉम के साहित्य विभाग के संपादक बानी)

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