पूर्णिया। बिहार के पूर्णिया जिला में एगो गांव अइसनो बा जहँवा लड़कियन के जन्म पर खुशी मनावल जाला, आ ओहिजा दहेज लिहल आ दिहल अभिशाप समझल जाला।जी हाँ, पूर्णिया जिला मुख्यालय से पांच किलोमीटर दूर बर्माटोला गांव में दहेज लिहल आ दिहल गांव खातिर अभिशाप मानल जाला। अगर कवनो व्यक्ति दहेज लेला आ देला, त ओकरा खिलाफ गांव वाला लोग बइठ के सामाजिक बहिष्कार से लेके आर्थिक दंड तक के सजा सुनावेला।
एही गांव के विद्यालय के एगो शिक्षक नंदकिशोर मेहता के कहनाम बा कि एह गांव में ई चलन पांच छह दशक पहिले शुरु भइल रहे, जवन कि अबो बदस्तूर जारी बा। उनुकर कहनाम बा कि एह प्रथा के असर अब आसपास के गांवन में भी देखे के मिल रहल बाटे, जेकरा फलस्वरुप लोग दहेज लेवे-देवे से इंकार क रहल बाटे। मेहता के कहनाम बा कि एह गांव के लोग बेटी के 'लक्ष्मी' के रुप मानेला, त फेर लक्ष्मी का सामने पइसा के का मूल्य बा?
गांव वालन के कहनाम बा कि पहिले एहिजा के लोग भी बेटी के शादी में दहेज देत रहे, परंतु चार-पांच दशक पहिले पंचायत के बैठक में लोग सामूहिक तौर पर निर्णय ले के दहेज लेवे आ देवे पर प्रतिबंध लगा दिहल। एह बारे में प्रवेश कुमार मेहता के कहनाम बा कि शुरु में त एह प्रतिबंध के लागू करे में बहुत दिक्कत भइल, लेकिन अब ई एह गांव के परंपरा बन गइल बाटे। उनुकर कहनाम बा कि तीन साल पहिले एह गांव के ही एगो परिवार अपना लइका के शादी में दहेज लेले रहे, ओकरा बाद गांव वाला लोग ओह परिवार के ना सिर्फ सामाजिक बहिष्कार कइले रहे, बल्कि ओह परिवार के 20,000 रुपया जुर्माना के सजा भी सुनावल गइल।
एह गांव में करीब सौ परिवार बाटे, जवना में से हर साल 12 से 15 लइका- लइकी के शादी होला। एह गांव के कई लइकियन के बियाह बिना दहेज के भइल बा, जवन कि आज अपना पति का संगे सुखमय वैवाहिक जीवन बिता रहल बाडी सन। (साभार: दैनिक हिंदुस्तान)


