बहुत बोझिल मन से हम ई सवाल कइ रहल बानी आजु अपना संउसे देश से, आ खास कइ के मुंबई महानगर से, काहें कि ई सब लोग काल्हु 26/11 के बरसी पर मातम मनाई, लेकिन तबो हमार ई प्रश्न, यक्ष प्रश्न के रुप में सबके सामने खड़ा रही – कि का फायदा 26/11 के मातम मनवला से, जब एही मुंबई में, आजुवो, एह बाहरी आतंकियनि से बेसी क्रूरता देखावे वाला आ मुंबई के करेजा रोज- दर- रोज छलनी करे वाला दल मनसे आ शिवसेना, तालिबान आ लश्करे तैयबो से जादा खतरनाक रुप में मौजूद बाड़े।ऊ आतंकी त बाहर से आइल रहले आ अंग्रेजन लेखां बाहरी लोगन के आपन निशाना बना के चलि गइले, लेकिन ई आतंकी त एही धरती के उपज हवे आ अपने लोगन के करेजा रोज छलनी कइ रहल बाड़े। तब दूनों में अंतर कइसन? खाली आपन आ अनकरे के नूं? लेकिन साहब, जे ई दर्द सहत बा ओकरा से पूछीं कि अपना लोगन के दिहल घाव आ अनकर दिहल घाव में कतना अंतर होला? कतना पीड़ा होला??
फेर हमार सवाल एहू दिशा में जायज बा कि जब हम आजु ले सक्षमें ना भइनी एह हमला के दोषी लोगन के सजा देबे में, तब एह मातम के का मतलब? ई घडियाली आंसू ना त आउर का कहाई? एकर दोषी अजमल कसाब, आजु तक बडा शान से एह देश के छाती पर मूंग दरि रहल बा, आ हमरा देश के मानवाधिकार आयोग खाली एही बात के पता लगावे में परेशान रहता कि दूनू बेरा ओकरा के, जेल में, उत्तम कोटि के बिरियानी परोसल गइल ह कि ना? आ ओकरा के खा के ओकर स्वास्थ्य ठीक बा कि ना? ...एह मानवाधिकार आयोग के, अपना देश के ओह लोगन के पीडित मानवता के कहाँ चिंता सतावत बा, जे एकरा में या त शहीद हो गइल, भा अपंग आ अलचार होके अपना जिनगी के बोझ लेखां ढोवे के मजबूर हो गइल। एह मानवाधिकार आयोग के एको सदस्य के त हम आजु तक, जाके ओह देविका नांव के दस बरिस के लडकी के हाल-चाल पूछत, चाहें ढाढस बन्हावत, चाहे ओकरा भविष्य के कवनो चिंता करत आजु ले ना देखनी, जवन ओह 26/11/08 के दिन, सी.एस.टी. रेलवे स्टेशन मुंबई पर, एही कसाब मियां के निर्दयी गोली के शिकार हो गइलि, बिना कवनो दोष के, आ जवन अपना दसवें बसंत से बैसाखी के मोहताज हो गइल। का ई मानवाधिकारी लोग कबो ओकर आंसू पोंछल? ओह लोगन का त ईहो मालुम ना होई कि ई 26/11 अइसन जाने कतने अबोधन के अपंग आ अनाथ कइ गइल। एह मानवाधिकारी लोगन का, जेकरा के, ई देश आ देश के सरकार केन्द्रीय मंत्रियन लेखां ओहदा आ सुविधा देले बिया, ओह लोगन का अपना भत्ता, भाषण आ सुविधा से फुरसत होखे तब नूं? आ जब कबो फुरसत मिलतो बा त ऊ खाली पाकिस्तान के चिंता में बीति जाता। कसाब आ अफजल गुरु के सुविधा के ख्याल राखे में बीत जाता। एह से त नीमन रहित कि इहनियो के मौके पर मारि गिरावल गइल रहित। ना रहित बाँस, ना बाजित बंसुरी। इन्हनी के सुरक्षा पर देश के धन बांचित, से अलग।
अब एक नजर मुंबई आ मराठी के तथाकथित शुभचिंतक लोगन पर डललो जरुरी बुझाता, जे लोग कबो दक्षिण भारतीय त कबो उत्तर भारतीय के नाम पर रोज ब रोज देश के बांटे के कोशिश में अपने राजनीति के रोटी सेंके में लागल रहता, आ ई देखावे में लागल रहता कि हम बड़ त हम बड़। ई बड़ लोग ओह दिन अपने मानि में लुकाइल रहे, आतंकियनि के गोली से अपना नगर वासियनि के बचावे खातिर एह लोगन के गुंडा वाहिनी, सडक आ मुहल्ला के कवनो कोना में ना नजर आवत रहे। ऊ गुंडा वाहिनी, जे हर दिन प्राय: कवनो ना कवनो बहाना बना के, निहत्था, आ अपना मेहनत का बल पर रोजी रोजगार में जुटल टैक्सी ड्राइवर, खोमचा वाला आ फेरी वाला लोगन के, उत्तर भरतीय के नाम पर सरे आम पीटि देबे में गुरेज नइखे करत। जब ना तब मनोज तिवरी जइसन कलाकार के घर पर पथराव कइ देता, त कबो कवनो टीवी चैनल चाहें समाचार पत्र के कार्यालय पर हमला बोलि देता आ करोड़न के, अपने देश के सम्पत्ति के नोकसान पहुँचा देता।
एगो बात याद दिया दीं एह लोगन के, जे ओह 26/11 के भयंकर दिन के, दिन राति के मेहनत कइ के जे एह मुंबई नगर के बचवले रहे, ऊ कवनो खाली मराठी सेना ना रहे, एह देश के राष्ट्रीय सेना रहे, ऊहे राष्ट्रीय सेना, जवना राष्ट्रीय शब्द से एह लोगन का आजु घृणा हो गइल बा, आ अपना के खाली मराठी जइसन खोल में समेटे के चेष्टा कइ रहल बा। हम जानतानी कि बडा मेहनति से महाराष्ट्र जइसन जाने केतने प्रांतन के जोड़ के ई देश बनल बा, बाकी देश के मतलब ऊ होला कि 26/11 के आपरेशन में जे शहीद भइले, ओह में महाराष्ट्र पुलिस के जांबाज सिपाही हेमंत करकरे, सालवस्कर आ आमटे का संगे ऊ मेजर उन्नीकृष्णन भी रहले, जे दक्षिण भारतीय रहले, जेह लोगन के कबो बाल ठाकरे साहब भगावल चाहत रहले, आ ऊ बिहार रेजीमेंट से जुडल रहले, जवना बिहारी लोगन के आज भी राज ठाकरे आ बाल ठाकरे भगावल चाह तारे एही मुंबई से। उनुका अलावा एनएसजी के हवलदार गजेन्द्र सिंह भी आपन जान देके मुंबई के ओह वहशियन के हाथ से बचवलन, ऊहो उत्तर भारतीय (देहरादून से) ही रहले। एहिजा हम याद दिलावल चाहेब कि एह हमला में जे केहू शहीद भइल ऊ खाली महाराष्ट्र खातिर ना, बल्कि पूरा राष्ट्र के रक्षा खातिर शहीद भइल। एह चाचा- भतीजा से बड़ काल मुंबई खातिर के बा दोसर... ?
प्रांतन के जोडि के देश भले बनेला, बाकी देश बनला के बाद देश से बड़ केहू ना होला, ना कवनो प्रांत, ना कवनो आदमी। मुंबई पर हमला खाली मुंबई भा कवनो महाराष्ट्र पर हमला ना रहे, ई मुंबई के बहाने संउसे देश के करेजा पर हमला रहे, जवना के दर्द संउसे देश महसूस कइले रहे, आजु तक कइ रहल बा, आ सदियनि तक करत रही।
(लेखक प्रसिद्ध भोजपुरी पत्रिका 'भोजपुरी माटी' के संपादक आ भोजपुरिया डॉट कॉम के साहित्य विभाग के संपादक बानी)


