लगभग आतंक के पर्याय बनि चुकल माओवाद, जवना तरह से धीरे-धीरे, सधल पांव, भारत के धरती पर आपन पांव पसार रहल बा, ओह से कबो अफगानिस्तान में एही तरे पसरत- पसरत सत्ता पर कब्जा जमा लेबे वाला तालिबानियन के याद ताजा हो रहल बा। क्रूर एह हद तक कि जवना के लिखे में कलम आ बोले में जबान तक घबरा जाता आजो. हलांकि हमरा ओकर वर्णन नइखे करे के एहिजा, फेर से, कारण ओह लोग के क्रूरता जग जाहिर बा, आ आजुवो ऊ लोग ओही तरी सक्रिय बा अफगानिस्तान से बेदखल भइला का बादो, जवना के नजारा हमनी का देखे के मिलि रहल बा, लगातार पाकिस्तान के स्वात घाटी में।
खैर, हम बात करे चलल बानी अपना देश में ठीक ओही राह पर चलत, बढत, पसरत माओवाद के। माओवाद जवना के जन्म नक्सलवाद से मानल जाला, आ जवना के बारे में ई कहल जाला कि एकर जन्म गरीबी, अन्याय, शोषण, असमानता आ सरकार के दू-मुहाँपन के चलते भइल अउर सबसे पहिले आदिवासी इलाका मे भइल, हलांकि अबहियों ई मुख्य रुप से आदिवासिये इलाका में सक्रिय बा, लेकिन धीरे-धीरे एकर वर्चस्व इतर गांवन के अलावा शहरन तक में होत लउके लागल बा, जहाँ ई शोषित आ उपेक्षित मजदूर वर्ग के सहारा लेके आपन पैठ निरंतर बनावे के कोशिस करत लउकि रहल बा।
शोषण के प्रति कवनो विरोध भा विद्रोह के हम कबो के विरोधी ना हईं, ना भइल चाहबि, कारण हमहूं एही सर्वहारा चाहें मजदूर वर्ग के एगो हिस्सा हईं, लेकिन एकरा बादो विद्रोह के एह स्वरुप के हम कबो समर्थन ना कइ पाइबि, जवन स्वरुप आज के दिन कहीं नक्सलवाद चाहें माओवाद के नाम पर एह दल के लोग अख्तियार कइ रहल बा। विरोध ना नरसंहार ह। राउर लडाई सरकारी तंत्र से बा त रउआ ओकरा से लडीं, लेकिन जवना मासुम आ शोषित जनता खातिर हथियार उठवले बानी, चाहें खुद अपना के जवना वर्ग के मानि रहल बानी, मौका पवला पर ओहू असहाय जनता के संहार करे से जब नइखी चूकत, त फेर रउआ सर्वहारा कवना लेहाज से भइनी? का त कभी- कभी आपन जान बचावे खातिर इहो करे के परेला, पुछ्ला पर राउर जबाब इहे रहल बा, त फेर फर्क का रहि गइल नरसंहारी शासक वर्ग में आ रउआ सभ में? आपन जान केकरा ना प्यारा होला साहब?
इहे सब देखि के हमरा लागि रहल बा कि एह देश में रउआ सभ के माध्यम से एगो नया तालिबान के जन्म हो रहल बा, ना त साहब गांव-घर से शुरु होखे वाला विरोध भा विद्रोह करे वाला के पास आजु अति आधुनिक अइसन अइसन हथियार भला कहाँ से आ गइल, जवन आजु ले पुलिस भा सेना तक के पास में नइखे। असलहा, बारुद, विस्फोटक ई कुल्हि का बिना पइसा के मिलि रहल बा रउआ सभ के? त फेर ई पइसा आवत कहाँ से बा? जाहिर बा एहिजे के डरल- सहमल पुंजीपति लोग से, हत्या आ अपहरण से, भा एकरा भय से खौफजदा लोगन के पास से। यानि ठीक ओही तरीका से जवना तरह से तालिबानी आ नेपाली माओवादी लोगन का मिलत रहे। लेकिन भारतीय माओवादी भाई साहब सभे, रउआ सभे शायद ई भुला जा रहल बानी कि अपना लाख प्रयास के बावजुद एही तालिबानी लोगन का अफगानिस्तान से आ नेपाली माओवादी लोगन के नेपाल के सत्ता तक पहुँचला के बादो ओकर सुख भोगल नसीब ना भइल। जाहिर बा, भारत में रउओ सभ के मनसा पूरा ना हो सके, अगर इहे रवइया रहल त।
- अनिल ओझा नीरद
(लेखक प्रसिद्ध भोजपुरी पत्रिका 'भोजपुरी माटी' के संपादक आ भोजपुरिया डॉट कॉम के साहित्य विभाग के संपादक बानी)


