बहुत हो गइल सिहुर-सिहुर। बहुत हो गइल मिउँ-मिउँ। बहुत हो गइल स्वागत सम्मान। बहुत हो गइल चिरउरी, हथजोरी, निहोरा अउर जाने का-का। लेकिन अब पानी नाक का ऊपर जात बुझा रहल बा। अब सब्र के बान्ह टूटि रहल बा। अब कुछ करे के परी। कुछ अलग हट के। आ ऊ अलग हटल होई अधिवेशन के जगह आन्दोलन। ऊहो साधारण ना सक्रिय आन्दोलन।तब सवाल उठता कि ई आन्दोलन के करी? जाहिर बा ऊहे करी जे आजु ले अधिवेशन करत आइल बा। लेकिन एकरा खातिर ओकरा बूता तैयार करे के पडी। साहस जुटावे के पडी। कपार पर पगरी ना कफन बान्हे के पडी। चले के परी ओह संसद के द्वार पर धरना, प्रदर्शन आ लाठी खाये खातिर, जवन संसद भोजपुरी भाषा के ओकर हक नइखे देत। लडे के पडी ओह सांसद लोगन से, जे हमनिये के वोट पा के संसद पहुंचता, सरकार बनावता आ एकरा बाद हमनी के हक के बात भुला जाता। इयाद दियावे के परी ओह लोगन के कि बहुत सूति चुकल लोग कान में तेल डालि के, भोजपुरी के नाम पर, अब जागे के परी ना त हमनी का अब ओह काने के काटे के तेयार हो के आइल बानी जा, जे हमनी खातिर तबो बहिर रहे आ कटइला के बादो बहिरे रही।
बहुत हो गइल हमनी के गांधी गिरी, अब गांधी उग्रवाद होई। सन सैंतालिस से पहिले सन नयालिस होई। अउर ई त शाश्वत सत्य ह। बेयालिस के बादे सैंतालिस आवेला। हमनिये के भुला गइल रहनी हँ जा। नीक कइल लोग कि हमनी के इयाद दिया दिहल। पहिले करो या मरो होला तब आजादी मिलेला। तहनिये लोग कइले बाडS, अब तहनिये लोग भुगतS। या त सीधा- सीधा हमनी के हक द लोग, ना त आन्दोलन झेले खातिर तेयार हो जा लोग।
ताज्जुब बा कि 542 सीट के संसद में कम से कम 100 गो सांसद त खाली भोजपुरिये क्षेत्र से जीति के जा तारे, आ सरकार चाहें जे कवनो लीड पार्टी के बने मंत्रियो पद पर एह लोगन के संख्या कम नइखे रहत, बाकी तबो भोजपुरी के मान्यता के बात धइल के धइल रह जाता। मतलब ई लोग या त चाहत नइखे या फेर एह में ओह लोगन के आपन कवनो स्वार्थ चाहें राजनीतिक लाभ नइखे नजर आवत। ना त चाहि देउ लोग आ ई काम ना होखे, ई बात असंभव बुझाता। एगो सुदीप बंदोपाध्याय चाहि दिहले ईमानदारी से त मैथिली के मान्यता मिली गइल, जबकि ऊ ना मैथिली क्षेत्र के रहले, ना मैथिली भाषी। लेकिन मैथिली भाषी लोगन के हक जायज समझले त आवाज उठवले आ हक ले के रहले।
हमरा इयादि परता दू साल पहिले अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के सासाराम अधिवेशन में, मंच पर दू दू गो केन्द्रीय मंत्री मीरा कुमार आ बाबू रघुवंश नारायण सिंह रहले, आ दूनो जाना ई वादा कइले रहले कि अबकिये सत्र में ई काम हो जाई, लेकिन ना भइल। त का समझल जाउ, ओह लोगन में ईमानदारी के कमी कि मातृभाषा से गद्दारी? हमहीं ना मानल रहीं, ना त डा. प्रभुनाथ सिंह ओही साल दिल्ली के जंतर- मंतर से आन्दोलन के बिगुल बजावे खातिर तैयार रहले, बाकी हमनी सभ आदमी एह दूनो मंत्री के बहकावा में आ गइनी जा।
सासाराम अभिवेशन में हमहीं एह आवाज के सबसे बड विरोधी रहनी, लेकिन अब हमरा बुझाता कि ऊ हमार भूल रहे। लोहा गरम रहे, ओही घरी चोट कइल चाहत रहे। लेकिन चलीं देर आयद दुरुस्त आयद के तर्ज पर जबसे जागS तब सबेरा वाली बात के मानि के कहि रहल बानी कि हम आपन भूल सुधारे के तेयार बानी आ अब जे केहू एह आन्दोलन के आगे बढाई ओकरा साथे रहे के वादा कर तानी। अफसोस बा कि भोजपुरी आन्दोलन के एगो सजग पहरुआ रहले डा. प्रभुनाथ सिंह, ऊ अब हमनी के बीच नइखन, जवना से भोजपुरी आन्दोलन के कमर टूटि गइल बा, ना त अगर ऊ रहिते आ कहीं जो रायपुर अधिवेशन में शामिल हो गइल रहिते तब त एह आन्दोलन के ओही दिने नेंव पडि गइल रहित अउर हो सकत रहे कि दिल्ली कूच करे के आ संसद के घेराव करे के रुप-रेखा आ दिन-तारीख ओही दिने धरा गइल रहित।
लेकिन खैर, हमरा विश्वास बा कि एगो प्रभुनाथ बाबू गइले त का भइल, भोजपुरिया समाज के लोग अभी अतना कमजोर नइखे हो गइल कि ऊ अपना बीच से दस-बीस गो प्रभुनाथ सिंह ना पैदा कइ लीही। एह देश के आजादी के पहिला लडाई जवना समाज के लोग छेडले, आ सबसे पहिले लडले होखे ऊ कतनो दूबर हो जाई त का ह बाकी मंगल पांडे आ कुंवर सिंह के खुन के उबाल अबहिंयो ओह लोगन के भीतर बा, जवन तनिकी भरि उकसवला पर कबो बाहर आ सकेला।
त आईं आजु हम ओही खुन के आवाहन कइ रहल बानी, भोजपुरी भाषा खातिर, भोजपुरिया लोगन का एक बेरि फेर कुछ ओइसने लडाई लडे के जरुरत बा। माई बोली पुकार रहलि बा, अपना दूध के कर्ज चुकाये बदे। एकर हद दिआवल जरुरी बा, जवन अब अधिवेशन से ना आन्दोलने से मिलि सकेला। अब हमनी का संकल्प लिहल जाव कि अब अधिवेशन के ना आन्दोलन के जरुरत बा भोजपुरी भाषा के अस्मिता के पहचान खातिर। देश के कवनो प्रांत में हिकारत का नजर से ना देख्ल जाईं जा एहू खातिर।
(लेखक प्रसिद्ध भोजपुरी पत्रिका 'भोजपुरी माटी' के संपादक आ भोजपुरिया डॉट कॉम के साहित्य विभाग के संपादक बानी)




बहुत बढ़िया लिखले बानी रउवा और भोजपुरी के इतिहास के अपना सामने राख के रउवा लिखले बानी , हमारा भोजपुरी के बारे में बहुत कम अइसन लेख पढ़े के मिलल बाटे , एह से हम राउर शुक्रगुजार बानी की रउवा असलियत के सामने ले के आवे के कोशिस कईले बानी |
और रउवा भोजपुरिया लोगन के जगावे के भी कोशिश कॉइले बानी |
उमेद करत बानी की भोजपुरिया लोग रउवा एह लेख के पढ़ी और उनकर सुतल आत्मा के कुछ ता धिक्कार जइसन शब्द के उतपत्ति होई जवना से भोजपुरी खातिर एह आन्दोलन में ( अब अधिवेशन न आन्दोलन कहाई ) में ऊ लोग शामिल होई ...
हम ता जुड़ गईल बानी एह आन्दोलन में काहे की भोजपुरी हमार भाषा ही ना हवे बल्कि हमार संस्कार हवे और हमार संस्कार के संगे केहू खिलवाड़ करी ता वोकर का हाली होई ऊ ता उहे जानी | हमनी के भाषा हमनी के संस्कार बन के हमनी के खून में दौडे ला | शयेद लोगन के एह बात के मालूम नईखे लेकिन अब मालूम करावे के और बतावे के साथ साथ में भोजपुरी के असली पहचान दिलावे के समय आ गईल बाटे |
जय भोजपुरी
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