कवि परिचय: जिला कैमूर भभुआ के परसियां गाँव के मूल निवासी प्रमोद कुमार तिवारी जी भोजपुरी के एगो उभरत कवि आ लेखक हईं। इहाँ का नई दिल्ली से निकले वाली प्रसिद्ध पत्रिका "द संडे इंडियन" के भोजपुरी संस्करण के वरिष्ठ उप-संपादक रह चुकल बानी, अउर फिलहाल साहित्य अकादमी में कार्यरत बानी। हिन्दी आ भोजपुरी में लिखल प्रमोद जी के रचना हंस, कथादेश, कादंबिनी, आजकल, हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, पाती, भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका आदि में पिछला 9 साल से छप रहल बाडी स।
इलाहाबाद विश्वविधालय आ जेएनयू से आपन शिक्षा पूरा कइला के बाद इहाँ का संगीत से भी कई साल ले जुडल रहनी। हिन्दी अकादमी द्वारा नवोदित लेखक सम्मान पा चुकल प्रमोद जी एनसीइआरटी खातिर कई गो किताब भी बनवले बानी। इग्नू मे भोजपुरी के जवन आधार पाठयक्रम शुरु कइल गइल बाटे, ओकरा पाठ-लेखकन के पैनल में भी प्रमोद जी बानी। हमनी के विशेष आग्रह पर भोजपुरिया डॉट कॉम के पाठकन खातिर उहाँ का इ कविता भेजनी ह। - संपादक
कमेसरा के दादी, कांपत आवाज में
गरियावत रही ब्रह्मा विष्णु महेश के,
उनका झुर्रियन में अंटकल रहे
ढेर सारा लाज के लाली।
नटवर नारायन त हरमेसे से चालू ठहरले
आ ब्रह्मा के बुढ़ौती के खयाल त भाई करहीं के पड़ेला
ढेर होई त उनका सन जइसन दाढ़ी में करिखा आ अलकतरा पोताई।
बाकिर हर बार पकड़ा जाले बेचारे बमभोला
अड़भंगी, नसेड़ी, शंभु के खूब होला मलामत
कि कीरा बिच्छी वाला बौड़म के हाथे पड़ गइली सुकुमारी गउरा।
खेत-खरीहान तक पसरल जात रहे
गारी के सुर,
का जाने का रहे गारी में
कि सास के मार भुला गइल फुलमतिया
नयका पाहुन के गरियावे के बोलावा पा के।
आ रसिक राजा दशरथ से मोछमुंडा देवर तक
सरपट दउड़े लागल गारी के सुर
गनेस बो त, एतना डूब के जोड़त रही
रिश्तेदारन के नया संबंध
कि बेमानी हो गइल रहे
अंचरा धर के रोवत लइका के आवाज
इंडिया गेट जइसन पेट वाला भसुरजी
गवनिहारिन के दीहले दू गो कड़कड़ सौटकिया नोट
चउठारी आइल बुढ़उ के गारी बिना
एकदम फीका लागल खाना
खूब सरपले गाँव वालन के संस्कार के।
बी.एच.यू. के बिरला छात्रावास के पुरान छात्र
थरिया पीट-पीट नाचत,
फागुन के एगो रात में
यौन संबंध प कइलस रिसर्च
सबेरे गर्दन प चूना थोप के निकलल
डी.लिट. के डिग्री जइसन।
मंत्रीजी चेलन से पूछत रहने -
आहो, कुछ भाव गिर गइल बा का एह साल
अस्सी के होली में ससुरा ना लेहले स हमार नाम
बहुत दिनन से मुंह फुलवले अलमगीर भाई के
कबीरा के बहाने एतना गरियवले गिरिधर पंडित
कि ‘ससुरा सठिया गइल बा’ कहत
उनका गले लगवहीं के पड़ल।
मन भर पाहुन के गरिया लेला के बादो
बहुत कुछ बांचल रह गइल रहे
जवना के अँचरा के खूंट में बान्ह के
घरे ले गइल रधिया
अउर जवना के कई दिन तक चभुलावत रहले
पोपला मुंह वाला अजिया ससुर।
बाकिर मुई! का जाने कइसन गारी रहे ओह बचवा के
कि हो गइल दंगा
अउर धह-धह जरे लागल पूरा के पूरा शहर
जवना के बुझावत रहे लोग
एक दूसरा के ख़ून से।



राउर "गारी" बहुत नीक लागल | बधाई | असहीं लिखत रहीं |
- रामरक्षा मिश्र विमल
likahat rahii . Dhanyabad.