कवि परिचय: गुरुचरण सिंह जी हिन्दी आ भोजपुरी के सशक्त कवि, कथाकार, आलोचक आ निबंधकार हईं। गुरुचरण जी के रचना में भारतीय समाज के त्रादसी आ राष्ट्रीय चेतना के दर्शन स्वाभाविक रुप से हो जाला। इहाँ के लिखल रचना विभिन्न पत्र-पत्रिकन में नियमित रुप से प्रकाशित होत रहेले। एकरा अलावा इहाँ का कई गो स्कूल- कॉलेजन में चल रहल किताबन के संपादनो कइले बानी।
कलम के धनी गुरुचरण जी भोजपुरी आन्दोलन से भी जुडल बानी।साल 2006 में इहाँ का अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान मुख्य संयोजक के सराहनीय भूमिका निभवनी। इहाँ का अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के संचालन समितिके सदस्य बानी, आ एकरे ईकाई अखिल भारतीय भोजपुरी स्वाभिमान आन्दोलन के मुख्य संयोजक बानी।
फिलहाल इहाँ का एस. पी. जैन कॉलेज (सासाराम, रोहतास, बिहार) के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग में प्राध्यापक बानी।
गुनगुनात रहलS जिनिगी भर अबो कवनो गीत सुनावS ।
मंजूषा में बन्द ओजमय कविता के घूँघट सरकावS ।।
पडे मर्म पर चोट व्यक्ति आहत होके गिर जाला
तबे उठेला कलम काव्य कागज पर तबे रचाला
देखे जब निर्बल के संग दानव के राड़ बेसाहल
कवि तब निर्भयता से छाती खोल खडा हो जाला
दानवता से त्रस्त मनुज के व्यथा कथा बतलावS ।
मंजूषा में बन्द ओजमय कविता के घूँघट सरकावS ।।
जब अदिमी रावन के भय से त्राहि त्राहि चिकरेला
बड़का न्याय प्रिय जोद्धा ना भयवश जब घर से निकलेला
मरघट के सन्नाटा में सब मुँह जाब के सिसके लागे
पोछें बदे लोर कवि ले के कलम हाथ में तबे चलेला
कायरता से ग्रस्त मनुज के तू अमृत संतान बनावS ।
मंजूषा में बन्द ओजमय कविता के घूँघट सरकावS ।।
देखS अब एहिजा रक्षक भक्षण पर उतर गइल बा
भइल सिपाही चोर कहो के सब घुसखोर भइल बा
देश बची कइसे जब रजे दुसुमन से मिल गइलन
भइल खजाना खाली इ सब उन्हुके कइल धइल बा
बाडS काहें चूप इहाँ आवS रहस्य बतलावS ।
मंजूषा में बन्द ओजमय कविता के घूँघट सरकावS ।।
देखS कवनो बेटी के इज्जत निलाम हो जाता
भय से भा लालच से अब बापो गुलाम हो जाता
निर्भय हो के अत्याचारी घुम रहल बा सगरो
जंगल राज भइल एहिजा जिनिगी छेदाम हो जाता
जनमन के नैराश्य मिटा आशा के दीप जरावS ।
मंजूषा में बन्द ओजमय कविता के घूँघट सरकावS ।।
भला बचाई कइसे ऊ जे खुदे लूट रहल बा
जनमन के आशा आके देखS अब टूट रहल बा
क्षणिक स्वार्थ में जननेता बैरी से मिल जा ताड़न
घर के भेदी लंका ढाहे साँचे बात कहल बा
तुलसी चंद कबीर गुप्त भूषण बन देश बचावS ।
मंजूषा में बन्द ओजमय कविता के घूँघट सरकावS ।।
बहुते गीत प्रेम के गवलS महराजन के हक में
बाकिर कहाँ प्रेम उमडत बा जनमन के रग-रग में
स्वार्थ प्रेम पर हावी होके निर्भय बन इठलाता
खून बहे अदिमिन के देखS सत्ता खातिर जग में
स्वार्थ रहित निश्छलता से परिपूर्ण प्रेम बरसावS ।
मंजूषा में बन्द ओजमय कविता के घूँघट सरकावS ।।



Regards with the anticipation.
Ajay Kumar Singh Advocate, Supreme Court of India, New Delhi.